September 28, 2010

ईदगाह कहानी समीक्षा / Eidgah Story Review / Eidgah Kahani Samiksha

     प्रेमचंद मेरे प्रिय कहानीकारों में से हैं, आज उनकी एक प्रसिद्ध कहानी 'ईदगाह' की समीक्षा आपके साथ साझा कर रहा हूँ 
    
     'बाल मनोविज्ञान' पर आधारित 'ईदगाह' कहानी प्रेमचंद की उत्कृष्ट रचना है। इसमें मानवीय संवेदना और जीवनगत मूल्यों के तथ्यों को जोड़ा गया है। ईदगाह कहानी मुसलमानों के पवित्र त्यौहार ईद पर आधारित है जो की शीर्षक से स्पष्ट है। पवित्र माह रमज़ान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आने पर मुसलमान परिवारों में विशेषकर बच्चों में त्यौहार का उत्साह बहुत अधिक प्रभावशाली दिखाई देता है। सभी छोटे-बड़े, गरीब-अमीर वर्ग-भावना से ऊपर उठकर धार्मिक प्रेम की गहरी समझ और सहानुभूति से भरपूर पूरे उत्साह में भरे हुए बड़े-बूढों के साथ-साथ बालकों का दल भी ईदगाह की ओर बढ़ रहा है। सभी बहुत प्रसन्न हैं। हामिद तो सबसे ज्यादा प्रसन्न है। वह चार-पाँच साल का ग़रीब सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। हामिद अब अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है। पहले जितना प्रसन्न भी रहता है।उस नन्हीं सी जान को तो यही बताया गया है कि उसके अब्बा जान रुपये कमाने गए हैं और अम्मी जान अल्लाह मियां के घर से बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गईं हैं। इसीलिए हामिद कि प्रसन्नता में कोई कमी नहीं है और हो भी क्यों? आशा तो बड़ी चीज है और वो भी बच्चों की आशा, इनकी तो बात ही ना करिए। इनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती हैं।
     हामिद के मित्रों के पास में खर्च करने के लिए पैसे ही पैसे हैं परन्तु खुद हामिद के पास सिर्फ 6 पैसे हैं। आकर्षण के कई स्थान हैं , आकाश की सैर कराने वाला हिडौला, चरखी और अनेक प्रकार के मनभावक खिलौने बच्चों को अपनी तरफ खींच रहे हैं
     मेले में बच्चे खूब खरीददारी कर रहे हैं, मिठाइयाँ खा रहे हैं और मेले का आनंद उठा रहे हैं परन्तु हामिद कुछ चीजों के दाम पूछकर उनमें गुण-दोष विचार कर मेले में आगे बढता रहता है और यही लेखक दिखाना चाहता है की किस प्रकार हामिद जैसों का वर्ग जो अपनी वास्तविक स्थिति को जानते हुए अपने सीमित साधनों से सही मार्ग चुनकर अपने समाज का निर्माण करता है
     हामिद बहुत जागरूक व्यक्तित्व वाला लड़का है, वह जनता है कि उसकी दादी को चिमटे कि बहुत जरुरत है इसीलिए वह मेले में फ़िज़ूल खर्च ना करके चिमटा लेना उचित समझता है। हामिद जब चिमटा लेकर आता है तो उसकी दादी बहुत गुस्सा होती हैं। तब हामिद अपराधी भाव से कहता है - "तुम्हारी अंगुलियाँ तवे से जल जाती थी; इसीलिए मैंने इसे ले लिया।"
     हामिद ने यहाँ पर बूढ़े हामिद का रोल निभाया है और बूढ़ी अमीना ने बालिका का रोल निभाया। वह रोने लगी और दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देने लगी। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस रस और स्वाद से भरा हुआ
हामिद अपनी उम्र के अनुसार एक आम बच्चे कि तरह भोला भी है जब बच्चों के बीच जिन्नात का प्रसंग छिड़ा तो हामिद बड़े आश्चर्य से पूछता है -"जिन्नात बहुत बड़े होते होंगे ना।" इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भोलापन भी उसके चरित्र कि एक विशेषता थी
     कहानीकार ने हामिद के चरित्र में वो सारी विशेषताएं भर दी हैं जो एक मुख्य किरदार निभाने वाले के चरित्र में होनी चाहिए
     जहाँ तक मेरा विचार है हामिद कि उम्र 7 से 8 साल के बीच होनी चाहिए थी जो कि कहानीकार ने शायद भूलवश 4 से 5 साल कर दी है। मुझे नहीं लगता कि 4 से 5 साल का बालक इतना जागरूक हो सकता है
     कुल मिलाकर अंत में यही कहा जा सकता है कि कहानीकार ने आर्थिक विषमता के साथ-साथ जीवन के आधारभूत यथार्थ को हामिद के माध्यम से सहज भाषा में पाठक के दिलो-दिमाग पर अंकित करने की अद्वितीय कोशिश की है।          - सत्यप्रकाश पाण्डेय 

58 comments:

  1. बहुत सटीक समीक्षा ...यह कहानी मेरी प्रिय कहानी रही है ..आभार

    ReplyDelete
  2. Replies
    1. sahi kehte ho, lekin samiksha chhoti hoti hai itni badi nahi ! par jo bhi hai, kaafi achhe se likhi gayi hai ! bahut sundar !

      Delete
    2. Awesome samiksha

      Delete
  3. प्रेम चाँद जी की अमूल्य कृति को कई बार पढ़ा है और हर बार सार्थकता नज़र आती है .... आपने सुंदर विश्लेषण किया है ...

    ReplyDelete
  4. yah kahani apne aap me ek misaal hai...sameeksha karke aapne yaad taza kar di.

    ReplyDelete
  5. सुप्रसिद्ध कृति की अच्छी समीक्षा

    ReplyDelete
  6. कहानी शिक्षाप्रद है!... छोटी उम्र में भी हामिद अपनी दादी के दुःख दर्द को समझ रहा है!....मर्म को छू ने वाली कहानी है यह!....आपने समीक्षा भी बेहद सुंदर की है सत्यप्रकाश जी!...शुभकामनाएं!

    ReplyDelete
  7. bhaayi jaan sbse pehle to akela ko akela ki bdhaayi or jo smiksha aapne likhi he iske liyen bhi bdhaayi sb jante he ke premchnd schche haalaton ke jivnt lekhk rhe hen unkaa sahity zindgi he koi klpna nhin or aapki smikshaa men schchaayi he bs aek bar or bdhaayi lekin zraa sochna aklaa pls akela braabr kyaa hogaa pliz farmulaa dekh kr btana intizaar rhegaa. akhtar khan akela kota rajsthaan

    ReplyDelete
  8. स्कूल के दिनों यह कहानी हमारे पाठ्यक्रम में थी, तभी पढ़ी थी, यादें ताज़ा हो गयी..
    अच्छा विश्लेषण, लिखते रहिये ...

    ReplyDelete
    Replies
    1. ye story mere class 4 me thi
      phadker maaza aa gaya

      Delete
  9. मैंने यह कहानी नहीं पढ़ी. आपकी समीक्षा से इसका ज्ञान हुआ. धन्यवाद.

    ReplyDelete
  10. जब पहली बार यह कहानी पढ़ी थी, अन्तरमन पर छा गयी थी। अभी भी कभी बच्चों को सुनाता हूँ, भावुक हो जाता हूँ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. Ji bilkul sahi kaha!!
      Hum aapse puri tarah se sahmat hai...

      Delete
  11. aआपने अच्छी कहानी की अच्छी समीक्षा की है। प्रेम चंद की कहानियां जीवन के धरातल पर संवेदनाओं को समेटे रहती है। धन्यवाद।

    ReplyDelete
  12. JITNEE BADIYA KAHANEE UTNEE HEE BADIYA SAMEEKSHA LAGEE . YADE TAZAA HO AAEE.
    PREMCHANDJEE KEE EK AUR KAHANEE SHAYAD MANTR NAAM THA USAKA..JISME UNHONE EK GAREEB KEE UDARTA BADE HEE SARAL PAR SASHAKT TAREEKE SE APANA BETA KHO JANE PAR BHEE DR KE BETE KO BACHA LIYA........EK DUM NISWARTH BHAV SE............
    SAMAY MILE TO AVASHY USAKEE BHEE SAMEEKSHA KARIYEGA.......
    AABHAR

    ReplyDelete
  13. बहुत खूब साहिब, पर पहले के बालक आजकल के बालकों से जयादा होशियार थे - गरीबी सब कुछ सिखा देती है साहिब.

    ReplyDelete
  14. प्रेमचंद की इस अद्वितीय रचना का अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया आपने.

    ReplyDelete
  15. बहुत सुंदर रुप से आप ने विश्लेषन किया, धन्यवाद

    ReplyDelete
  16. वाह जी, बचपन से पढ़ते आये जिस कहानी को, उसकी बढ़िया समीक्षा की आपने.

    ReplyDelete
  17. वाह जी !!!! एक तो प्रेमचंद जी की कहानी!!!!
    तिस पर आप की समीक्षा!!! बचपन की यादे ज़िंदा करने के लिए शुक्रिया जी!!!

    ReplyDelete
  18. इस कहानी पर चली एक बहस का एक नमुना यहा देखा लीजिये !
    http://hindini.com/fursatiya/archives/30

    ReplyDelete
  19. यह कहानी अद्भुत मानवीय संवेंदना की कहानी है।

    ReplyDelete
  20. प्रेमचंद की तो बात ही अलग है ।

    ReplyDelete
  21. ईदगाह कहानी की समीक्षा के लिए आभार वैसे अगर आपको याद हो ती वी पर भी ऐसा ही एक ऐ ड आता है शायद हेवाल्स केबल का जिसमे माँ रोटी बना रही है और उसका हाथ जलता देख उसका बेटा तार मोड़ कर चिमटा सा कुछ बनाता है जब भी उस ऐ ड को देखती हूँ ये कहानी मन में आ ही जाती है

    ReplyDelete
  22. ईदगाह कहानी के साथ कई सुन्दर सन्दर्भ जुड़े हैं....
    सुन्दर समीक्षा !

    ReplyDelete
  23. is kahani ko padi bhi hoon aur is par bani film bhi dekhi hoon par kai barsh gujar gaye magar aaj aapki samiksha padhkar phir kahani dimag me umad padi .badi sahajata se likha hai aapne sukoon mila padhkar .aap aaye mere blog par main aabhari hoon .

    ReplyDelete
  24. बहुत सुन्दर और शानदार समीक्षा लिखा है आपने! उम्दा प्रस्तुती!

    ReplyDelete
  25. chritr ke mnobhavo ko jb bhi ghre se smjha gya hai tb tb smikchha ke sath nyay hua hai . aap is ksauti pr khre utre hai.
    bdhai sweekar kre .

    ReplyDelete
  26. ये कहानी तो मुझे याद है,आपने बहुत ही अच्छी समीक्षा की है..जिसने नही पढ़ी वो जरूर पढ़ेगा...

    ReplyDelete
  27. ईदगाह शीर्षक देखते ही उंगलीने कुद बखुद क्लिक कर दिया ये कहानी बचपन में पढी ही नही खेली भी है । अमीना बनकर कभी हामिद बनकर । आग में तो बहादुर ही कूदते हैं, मेरा शेर बहादुर चिमटा ! हामिद का भोलापन और उसकी हाजिर जवाबी मन को तब भी मोह लेती थी ।

    ReplyDelete
  28. ईदगाह बाल मनोविज्ञान पर आधारित एक श्रेष्ठ कहानी है जिस पर समीक्षा देकर आपने कहानी की याद पुनः ताजा कर दी। आभार।
    हरीश

    ReplyDelete
  29. Apne Samiksha bahut hi Achhe tarike se kiya hai.
    Mujhe pasand aaya. Happy Diwali greeting.

    ReplyDelete
  30. यह प्रेमचंद जी की सबसे बेहतरीन कहानीयों में से एक है |बहुत अच्छी समीक्षा की है आपने |

    ReplyDelete
  31. bahut hi aacha i am same person as above

    ReplyDelete
  32. aapki samiksha me bhasha ke baare me bhi kuch baat karni thi aur samikasha bahut acchi hai

    ReplyDelete
  33. thanks thanks thanks thanks thanks thanks thanks...." " " " " " " " " "" " " " " """ "

    ReplyDelete
  34. Thank U very very much dude because I wanted this as my project.

    ReplyDelete
  35. आप कहानी का मर्म नहीं समझ पाएँ हैं

    ReplyDelete
  36. thank u.. mujhe ye padna dha exam ke lie

    ReplyDelete
  37. Kitna acha kahani Utna hi acha samiksha.
    Bravo

    ReplyDelete
  38. I am going to get marks 'coz of this only . So thanks

    ReplyDelete
  39. thanks soo much ... no doubt i will get full mark .. thanks for this site .

    ReplyDelete
  40. i just love this review....ty :)

    ReplyDelete
  41. thnx for this summary no doubt i will get full marks in the project

    ReplyDelete
  42. शिखा माहेश्वरी १४ मार्च २०१६
    संक्षिप्त और सटीक विश्लेषण | सारांश पढ़कर कहानीकार के लेखनी की उत्कृष्टता
    का बोध होता है |

    ReplyDelete
  43. sir! child psychology pr Prem chand ji ki gazab ki pakad thi....aur us zamane k 4-5 saal k child ka sense itna hota n=bhi tha..... apka blog pyara laga....sath bana rahe -Lori http://meourmeriaavaaragee.blogspot.in/

    ReplyDelete
  44. muje holiday homework me kopy karne ka chance mila

    ReplyDelete

तेजी से भागते हुए कालचक्र में से आपके कुछ अनमोल पल चुराने के लिए क्षमा चाहता हूँ,
आपके इसी अनमोल पल को संजोकर मैं अपने विचारों और ब्लॉग में निखरता लाऊंगा।
आप सभी स्नेही स्वजन को अकेला कलम की तरफ से हार्दिक धन्यवाद !!

Related Posts with Thumbnails